विदेश में गांधी, देश में गोडसे। जब अमेरिका जाते हैं तब गांधी के देश के होने का दम भरते हैं। इज्जत जो बढ़ जाती है। मगर जब भारत में रहते हैं तब गोडसे की पूजा करते हैं। कुछ लोग हैं ऐसे। वैसे हमारे देश के प्रधानमंत्री जब अमेरिका जाते हैं तब कहते हैं
महात्मा गांधी भारत की आजादी की लड़ाई के केंद्र बिंदु थे। लेकिन गांधी जी के कार्यों का विस्तार सिर्फ इतना ही नहीं था। महात्मा गांधी ने एक ऐसी समाज व्यवस्था का बीड़ा उठाया जो सरकार पर निर्भर ना हो।
और जब प्रधानमंत्री देश में रहते हैं तब क्या करते हैं? ये गांधी का अस्तित्व मिटाने में लग जाते हैं। चाल, चेहरा, चरित्र में इतना फर्क। सवाल केवल नैतिकता और सम्मान का नहीं है। सवाल है जनता क पैसे उड़ाने का। सुनने में सिंपल सा लगता है ना कि नाम बदल दिया। मगर इसके पीछे जो पैसा खर्चा होता है, वह हमारी आपकी कल्पना से भी बाहर है। 50 से लेकर के 100 करोड़
तक का खर्च होता है। इस सिंपल से काम में पैसा कहां से आता है? हमारी आपकी जेब से जिसे सरकारी टर्म में टैक्स कहा जाता है। यह कार्टून देखिए। एक तस्वीर कहते हैं हजार शब्दों के बराबर होती है। यह कार्टून देख के पता चल ही गया होगा कि खर्चे की वसूली किससे की जाएगी। प्रधानमंत्री की अगर कोई योजना उनकी खुद की लाई हुई है तो वह है प्रधानमंत्री नाम बदलो योजना। कैसे नाम की राजनीति में जनता को कंगाल बनाया
जा रहा है? नाम में क्या रखा है? से लेकर के नाम पर आधारित राजनीति तक का सफर हमने कब तय किया? आखिर मंशा क्या है? चलिए आज इस पे बात करेगी आपकी यह पॉलिटिकल नारी।
क्या आपने कभी गौर किया है कि विदेश में महात्मा गांधी की तारीफ और देश में गोडसे की विचारधारा का यह द्वंद्व क्यों है? अक्सर देखा गया है कि जब हमारे नेता विदेश जाते हैं, तो गांधी के देश से होने का दम भरते हैं, लेकिन देश में लौटते ही गांधी के अस्तित्व को मिटाने की कोशिशें शुरू हो जाती हैं।
आज हम बात करेंगे सरकार की एक अघोषित योजना के बारे में, जिसे आलोचक 'प्रधानमंत्री नाम बदलो योजना' कहते हैं। योजनाओं, सड़कों और शहरों के नाम बदलने का यह खेल केवल भावनाओं या राजनीति तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका सीधा असर आपकी और हमारी जेब पर पड़ता है।
आइये जानते हैं कि नाम बदलने की इस राजनीति (Rebranding Politics) के पीछे का सच और इसका भारी-भरकम खर्च।
मनरेगा (MNREGA) और गांधी के नाम से परहेज
ताजा मामला मनरेगा (MNREGA) का है। 2014 से पहले इसे कांग्रेस की विफलताओं का स्मारक बताने वाले प्रधानमंत्री मोदी, आज भी इस योजना को चला रहे हैं क्योंकि यह देश की जरूरत है। लेकिन अब खबर है कि इसका नाम बदलने की तैयारी हो रही है।
गांधी जी का नाम हटाने के लिए एक नया और भावनात्मक दांव खेला जा रहा है—'राम' के नाम का। तर्क यह है कि अगर गांधी का नाम हटाकर 'राम' का नाम जोड़ा जाएगा, तो विपक्ष इसका विरोध नहीं कर पाएगा। लेकिन क्या इससे मजदूरों का भला होगा?
योजना में किए गए बदलाव और हकीकत:
काम के दिन: 100 दिन से बढ़ाकर 125 दिन कर दिया गया है (जो अच्छी बात है)।
फंडिंग में कटौती: पहले केंद्र सरकार 90% खर्च देती थी, अब इसे घटाकर 60% कर दिया गया है। बाकी बोझ राज्यों पर डाल दिया गया है।
खेती के सीजन में काम बंद: बुवाई और कटाई के समय (लगभग 60 दिन) काम बंद रहेगा, ताकि मजदूरों की कमी न हो। इसे अधिकारों में कटौती माना जा रहा है।
केवल री-ब्रांडिंग: पुरानी योजना, नया लिफाफा
यह पहली बार नहीं है। 2014 के बाद से कई पुरानी योजनाओं के सिर्फ नाम बदले गए हैं। यहाँ कुछ उदाहरण हैं:
निर्मल भारत अभियान बना स्वच्छ भारत मिशन।
राष्ट्रीय विनिर्माण नीति बनी मेक इन इंडिया।
मूल बचत बैंक जमा खाता बना प्रधानमंत्री जनधन योजना।
राजीव गांधी ग्रामीण विद्युतीकरण बना दीनदयाल उपाध्याय ग्राम ज्योति योजना।
केवल योजनाएं ही नहीं, सड़कों और शहरों के नाम भी बदले गए। रेस कोर्स रोड 'लोक कल्याण मार्ग' बन गया और मुगलसराय स्टेशन 'पंडित दीनदयाल उपाध्याय जंक्शन'।
नाम बदलने का खर्च: आपकी सोच से भी ज्यादा!
नाम बदलना सुनने में एक साधारण सरकारी आदेश लगता है, लेकिन इसके पीछे जनता के टैक्स का हजारो करोड़ रुपये खर्च होता है। अगर मनरेगा का नाम बदला जाता है, तो अनुमानित खर्च कुछ इस प्रकार हो सकता है:
जॉब कार्ड्स: नए नाम वाले जॉब कार्ड छापने और बांटने का खर्च लगभग ₹375 करोड़ हो सकता है।
दीवार लेखन (Wall Painting): देश की 2.69 लाख पंचायतों में दीवारों पर फिर से नाम लिखवाने का खर्च करीब ₹200 करोड़ आएगा।
स्टेशनरी और स्टैम्प: रबर स्टैम्प, रजिस्टर, फाइल कवर बदलने का खर्च ₹50 से ₹100 करोड़ के बीच होगा।
विज्ञापन: नए नाम के प्रचार-प्रसार के लिए पहले साल में कम से कम ₹200 करोड़ का अतिरिक्त भार पड़ेगा।
इलाहाबाद का नाम प्रयागराज करने में ही ₹300 करोड़ से अधिक का खर्च आया था। वहीं, एक अनुमान के मुताबिक अगर 'इंडिया' का नाम आधिकारिक तौर पर हर जगह 'भारत' किया जाए, तो यह खर्च ₹14,000 करोड़ तक जा सकता है।
विज्ञापन का खेल: केंद्र का प्रचार, राज्य का खर्चा
आरटीआई (RTI) और मीडिया रिपोर्ट्स बताती हैं कि मोदी सरकार ने पिछले 8 सालों में विज्ञापनों पर मनमोहन सिंह सरकार के 10 सालों से लगभग दोगुना खर्च किया है (दिसंबर 2022 तक लगभग ₹6491 करोड़)।
अब एक नया पैटर्न देखने को मिल रहा है। केंद्र सरकार अपने प्रचार का खर्च बीजेपी शासित राज्य सरकारों पर डाल रही है।
चीते नामीबिया से आए, लेकिन दिल्ली में होर्डिंग का खर्चा मध्य प्रदेश सरकार ने उठाया।
वैक्सीन के धन्यवाद पोस्टर का खर्चा यूपी, उत्तराखंड और हरियाणा सरकार ने दिया।
गुजरात सरकार ने पीएम मोदी के 23 साल पूरे होने पर विज्ञापनों पर लगभग ₹8.81 करोड़ खर्च किए।
निष्कर्ष
सवाल केवल नैतिकता या सम्मान का नहीं है, सवाल जनता के पैसे का है। विकास के नाम पर हो रही इस 'री-ब्रांडिंग' से आम आदमी को क्या मिल रहा है? क्या नाम बदलने से रोजगार मिल रहा है या महंगाई कम हो रही है?
विरासत, संस्कृति और राष्ट्रवाद के नाम पर खेले जा रहे इस खेल को समझना जरूरी है।
आपकी राय: क्या आपको लगता है कि पुराने नामों को बदलने पर इतना भारी खर्च करना सही है? अपनी राय हमें कमेंट बॉक्स में जरूर बताएं।
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